गेहलत ने
आर्सीन नाम की गैस का पता लगाया | उसका एक बुलबुला स्वयं सुंघा और सदा के लिए इस संसार से विदा हो गए | अपने प्रयोग के विषय में वह
कुक्ष भी नहीं बता सके |
डेवी ने सन् 1800 में
एक दिन सोलह ' कवार्ट ' नाइट्रस ऑक्साइड
गैस सूंघी | इस गैस ने उसे प्रमत कर दिया | वह हसते रहे और इतना हसे की बेहोश हो गए जब
उनकी तन्द्रा भंग हुई तो वह एक प्रसिद्ध व्यक्ति हो चुके थे |
बात यह हुई की ऑक्सफ़ोर्ड के डॉक्टर बेडोज ने रोगियों का ठोस ( गोली
, पाउडर ) या तरल दवा की आपेक्षा गैसों द्वारा इलाज करने का निश्चय किया
|
इसके लिए गैसों के गुणों को जानना
आवाश्यक था परन्तु बलि का बकरा कौन बने ? तब डेवी ने स्वयं को प्रस्तुत किया और डॉक्टर बेडोज
उसे भिन्न-भिन्न गैसों सुंघा कर उनके प्रभावों
का निरिक्षण करने लगे |
डेवी का जन्म 1778 ई. इंगलैंड
के कार्नवाल नामक स्थान में हुआ | गावं
काफी छोटा था | पिता का भी जल्दी ही देहांत
हो गया | विधवा माँ और चार छोटे भाईओं
की जिम्मेदारी डेवी पर आ पड़ी | उन्हें
कविता में आनंद आता था | कुछ तुकबंदी वह स्वयं भी
करते थे | साउद और कालरिज जैसे प्रख्यात
कवि उनके मित्र थे | वह स्वयं भी कदाचित कवि
ही बनते ,
परन्तु परिस्थितियों ने
उन्हें रसायनशास्त्री बना दिया | उन्हें
एक दवाफरोश के यहां, जो थोडी बहुत चीर'-फाढ़ करता था,
नौकरी मिली और इस प्रकार उनका विज्ञान
से सम्पर्क स्थापित हुआ । जब उन्होंने डॉक्टर बेडोज के बारे में सुना तो गैसों के प्रयोग
के लिए उन्होंने स्वयं को समर्पित कर दिया । उन प्रयोगों के कारण वे कई बार मरते-मरते
बचे लेकिन अंत में हंसाने वाली गैस 'नाइट्रस ऑक्साइड‘ ने उसे प्रसिद्ध कर दिया । डेवी का गैस सूंघ
कर झूमना देखने के लिए अपार भीड इकद्रुठी होने लगी । जगह-जगह महफिलें जुडतीं और डेवी
को आमंत्रित किया जाता । बाद में यह गैस ऑपरेशन के लिए रोगी को बेहोश करने के काम आने
लगी ।
'आक्सीजन’ तथा ’नाइट्रस आँक्साइड'
के गुणों के बारे में उन्होंने
अनेक शोधपत्र प्रकाशित किये । उसकी ख्याति फैलती गई और एक दिन वह नवस्थापित रॉयल इंस्टीट्युट में "डिमान्सट्रेटर'
नियुक्त कर दिये गए। तब बिज्ञान
की कक्षायें नहीं लगा करती थी । वैज्ञानिक अपने विषयों पर भाषण दिया करते थे । श्रोताओं को टिकट लेकर हौल
में जाना पड़ता था । कहते हैं कि डेवी के भाषणों के टिकट बीस-बीस पौण्ड तक "में
बिकते ये । इसी से उनकी लोकप्रियता का अनुमान लगाया जा सक्ता है ।
डेवी की लोकप्रियता का एक अन्य कारण था उनका आविष्कृत
'सेफ्टी
लैम्प' अर्थात्
कोयले ,की
खानों में ले जाने वाला सुरक्षाप्रदीप । प्रतिवर्ष कोयले की खानों में जब तब विस्फोट
के कारण सैकडों मजदूर मर जाते थे । पृथ्वी के गर्भ में खुदाई करते समय चट्टानों की
दरारों से 'मार्श’
गैस निकलती यी ।
यह गेस मोमबत्ती आदि की नग्न ज्वाला का स्पर्श पाते
ही भयंकर विस्फोट कर देती थी । इस प्रकार प्रति वर्ष हजारों मज़दूर बच्चे अनाथ और स्त्रियाँ
विधवा हो जाती थीं । यह गैस कब, कहां निकल आयेगी,
कुछ निश्चित नहीं होता था । जब
गैस अधिक मात्रा में निकल आती थी तो विस्फोट
होने में विलम्ब भी नहीं होता था । अत्यन्त कम समय में हजारों फुट की गहराई से मजदूरों
के लिए भाग कर ऊपर आना असंभव होता था ।
डेवी ने जो लैम्प बनाया उसकी ज्वाला चारों ओर से तार की जाली की एक बेलनाकार चिमनी से घिरी रहती थी । जब गैस ज्वाला तक ' पहुंचती
थी तो हवा की कमी के कारण विस्फोट ' के
लिए पूरी आक्सीजन न मिल पाती थी। गैस वहीं चिमनी के अन्दर धीरे-धीरे जलने लगती थी । उसकी पीली चमक से काम करने वालों को खतरे का आभास हो जाता और वे तुरंत खान से बाहर भाग आते थे । थोड़े समय तक धीमी गति
से जलने वाली गैस वैसे भी तापक्रम पर अघिक
प्रभाव नहीं डाल पाती । लैम्प पर लगी जाली ताप को उच्चां नहीं चढने देती । इस प्रकार विस्फोट
नहीं हो पाता था ।
डेवी के लैम्प से विस्फोट
कम भी हो गये और पूर्व संकेत मिल जाने के कारन दुर्घटना कम हो गई। खान का मजदूर सदा
के लिए इस आविस्कार का ऋणी रहेगा | खान
के मालिको ने सन् 1818 में डेवी के स्वागत में एक भोज आयोजित किया था | इसमे
डेवी को लगभग 6 हजार पौंड के मूल्य की वस्तुये
भेट में दी गई |
डेवी ने अपने इस आविष्कार को सर्वाधिक सुरक्षित करां सकते थे । इससे उन्हें अपार धन राशि की प्राप्ति होती । उसके मित्र समय-समय पर
उन्हें सलाह देते रहते थे, पर उनके मस्तिष्क में कभी लालच का कोई भाव नहीं आया । वह निर्लिप्त
भाव से अपने काम में लगें रहे । उन्होंने एक
जगह स्वयं लिखा है, "मुझे पर्याप्त पुरस्कार मिल
चुका है । मजदूरों की प्राण-रक्षा ही स्वयं एक बहुत बड़ा पुरस्कार है । मानवता की यह
' सेवा
वास्तव मे अपनी एक अनूठी मिसाल है ।
डेबी ने अनेक तत्वों की खोज की । इसमें सोडियम,
पोटैशियम,
बेरियम व कैल्सियम प्रमुख हैँ ।
इसके लिए उन्होंने विद्युत विच्छेद का तरीका काम में लिया था। इस खोज के पहले सोडियम
व पोटेशियम के यौगिकों को भी तत्व समझा जाता था ।
डेवी के पूर्व यह धारणा
थी कि अम्लो में आँक्सीजन का होना आवश्यक है । पर डेवी ने यह गलत साबित कर दिया । उन्होंने हाइड्रोक्लोरिक
अम्ल का विश्लेषण किया और यह सिद्ध कर दिया कि इतने शक्तिशाली अम्ल में आक्सीजन नाम
मात्र को भी नहीं होता । यह डेवी ने ही बताया कि अम्ल का गुण ऑक्सीजन के कारण नहीं,
बल्कि हाइड्रोजन के कारण होता है
।
सन् 1806 में डेबी ने कई बहुत खोजपूर्ण व्याख्यान प्रस्तुत
किये । इसमें से कुछ व्याख्यान विद्युत और रासायनिक पदार्थों के आपसी सम्बन्ध पर भी
थे। गैसों के विषय में उनके विभिन्न आविष्कार तथा व्याख्यानों ने उनकी प्रसिद्धि चारों
ओर फैला दी । डेबी को देश-विदेश में अनेक पुरस्कार मिले ।
सन् 1812 में डेवी को "सर" की उपाधि दी गई । सन्
1820 मे उन्हें रायल सोसायटी
का अध्यक्ष चुन लिया गया । आज भी विश्व उनकी कार्यो को कृतज्ञता से याद करता है डेवी की स्मृति में रायल सोसायटी अब भी विज्ञान
के क्षेत्र में खोज करने वालों को सम्मानार्थ "डेवी मैडल'
प्रदान करती है |
डेवी का प्रारम्भिक जीवन कठिनाइयों से भरा था । उपकरणों के नाम पर वह चाय के प्यालों, टूटे कांच के गिलासों, सिगरेट के पाइपों और खाली शीशियों से प्रयोग किया करते थे । डेवी का जीवन सिद्ध करता है कि सर्व-सम्पन्न प्रयोगशालाएँ ही अनुसंधान कार्यं के लिए आवश्यक नहीँ है |
आगे चलकर उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी हो गई । उन्होंने एक धनाढ्य विधवा से विवाह मी कर लिया था परन्तु उनका पारिवारिक जीवन सुखी नहीं रहा ।
डेवी का प्रारम्भिक जीवन कठिनाइयों से भरा था । उपकरणों के नाम पर वह चाय के प्यालों, टूटे कांच के गिलासों, सिगरेट के पाइपों और खाली शीशियों से प्रयोग किया करते थे । डेवी का जीवन सिद्ध करता है कि सर्व-सम्पन्न प्रयोगशालाएँ ही अनुसंधान कार्यं के लिए आवश्यक नहीँ है |
आगे चलकर उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी हो गई । उन्होंने एक धनाढ्य विधवा से विवाह मी कर लिया था परन्तु उनका पारिवारिक जीवन सुखी नहीं रहा ।
डेवी से एक बार पूछा गया
कि उसकी सबसे बडी खोज क्या हैं । तब उन्होने मुस्करा कर उत्तर दिया था -'माइकेल फैराडे'
। यह डेवी का एक सहायक वैज्ञानिक
था, जिसने
आगे चलकर डेवी की भविष्यवाणी को सच साबित कर दिखाया । सन् 1829 में 51 वर्ष
की आयु में डेवी का स्वर्गवास, जेनेवा (स्विटजरलैंण्ड) में हुआ । उस समय भी वह अनुसंधान
में लगे हुए थे । पानी के जहाजों के पेंदे समुद्र के खारे पानी के कारण जल्दी गल जाते
थे । डेवी उन दिनों इसी समस्या पर महत्वपूर्ण कार्य कर रहे ये । जिस स्थान पर डेवी
का जन्म हुआ या, उसके निकट ही डेवी की भव्य मूर्ति स्थापित है|
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